हमें कोई रंगों से नफ़रत नहीं

हमें कोई  रंगों से नफ़रत नहीं

हमें कोई शिकायत नहीं,
हमें कोई नफ़रत नहीं
इस दुनिया के
किसी भी रंग से।

सुबह उठते ही
सफ़ेद रंग की रोटी खाते हैं,
चाय और दूध के साथ
दिन की शुरुआत करते हैं।

हफ़्ते में कभी-कभी
नारंगी गाजर का हलवा
मीठी खुशबू के साथ
हमारी थाली में उतर जाता है।

काला रंग तो
हमारा सबसे प्यारा है—
एक ख़्वाहिश है
कि एक दिन
मुझे भी एक काला कोट मिल जाए।

गाँव की हरी सब्ज़ियाँ
हमारी पसंद हैं,
धरती की खुशबू के साथ
थाली में हरियाली सजती है।

उनकी काली-काली आँखें
और काजल की लकीर
दिल को ऐसे छू जाती है
जैसे कोई मीठी धुन।

एक शौक़ है—
मेरे बगीचे में
लाल मंदार भी उगे,
और वहीं
पीले सूरजमुखी
धूप की तरह खिलते रहें।

एक सपना भी है—
कभी नीले समंदर को पार कर
नीले आसमान में उड़ूँ,
दूर किसी देश की ओर।

हमें नफ़रत नहीं
किसी रंग से,
किसी सीमा-सरहद से,
किसी जात से,
किसी मुल्क से।

हम तो बस
उन विचारों से परहेज़ करते हैं
जो इंसान को इंसान से छोटा दिखाएँ,
जो छल और धोखे से
पीठ में वार करें।

क्योंकि हम
उस धरती के लोग हैं
जहाँ
बुद्ध, आंबेडकर और फुले
बराबरी की मशाल जलाते हैं।

हमारा विश्वास है—
समानता में,
स्वतंत्रता में,
और बंधुता में।

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