हो सके-2
हो सके—
हम न मिल पाएँ
किसी चाय की मेज़ पर,
न हँस पाएँ
किसी मूवी डेट के बहाने।
हो सके—
हमारी मोहब्बत
किसी भीड़ में नहीं,
बस खामोशियों में जिए।
हो सके—
हम मिलें ज़रूर,
पर उस तरह नहीं
जैसे लोग मिलते हैं शहरों में।
हम मिलें—
किसी गाँव की धूल भरी पगडंडी पर,
मैं साइकिल चलाते हुए,
और तुम
सरकारी गाड़ी के शीशे के भीतर
एक ज़िम्मेदारी में क़ैद।
मन तो करेगा—
तुम्हें साइकिल के आगे
डंडे पर बिठाकर
पूरा गाँव घुमा दूँ,
पर तुम्हारी दुनिया में
मेरे लिए जगह नहीं होगी—
सिर्फ़ नियम होंगे,
प्रोटोकॉल होंगे,
और दूरियाँ होंगी।
हो सके—
मैं किसी कोने में
एक मामूली-सा नाम बनकर रह जाऊँ,
और तुम
किसी ऊँचे पद पर,
जहाँ पहुँचने के बाद
पीछे मुड़ना मना होता है।
हम आमने-सामने आएँ—
पर तुम पहचानकर भी
नज़रें झुका लो,
और मैं…
पहचानकर भी
तुम्हें पुकार न पाऊँ।
हो सके—
हमारी बातें
अब शब्दों में न हों,
बस अधूरी चुप्पियों में रह जाएँ,
जहाँ हर सवाल
बिना जवाब के मर जाता है।
कभी—
जब तुम अकेली हो,
और मैं भी…
तो शायद याद आए—
एक लड़का था
जो तुम्हें साइकिल पर बैठाकर
दुनिया दिखाना चाहता था।
और मैं—
किसी शाम
खुद से पूछूँगा—
क्या सच में
वो कभी मेरी थी भी…?
पर जवाब—
हमेशा की तरह
खामोश ही रहेगा।
क्योंकि—
कुछ मोहब्बतें
मिलने के लिए नहीं,
बस उम्र भर
अधूरी रहने के लिए होती हैं।