हो सके
हो सके—
हम न मिल पाएँ
किसी चाय की मेज़ पर,
न जा पाएँ
किसी मूवी डेट पर।
हो सके—
हम मिलें ज़रूर,
पर उस तरह नहीं
जैसे लोग मिलते हैं शहरों में।
हम मिलें
किसी गाँव की पगडंडी पर—
मैं साइकिल चलाते हुए,
और तुम
उसी गाँव में
सरकारी गाड़ी से
निरीक्षण के दौरे पर।
मन तो करेगा—
तुम्हें साइकिल के आगे
डंडे पर बिठाकर
पूरा गाँव घुमा दूँ,
पर सरकारी प्रोटोकॉल
इजाज़त नहीं देता।
हो सके—
मैं कहीं किसी सरकारी दफ़्तर में
एक साधारण-सा कर्मचारी बन जाऊँ,
और तुम
किसी ज़िम्मेदार पद पर बैठी हुई,
फ़ाइलों में उलझी रहो।
हम आमने-सामने आएँ,
पर पहचानकर भी
अनजान बन जाएँ—
क्योंकि हालात
इजाज़त नहीं देते।
हो सके—
हमारी बातें
अब शब्दों में न हों,
बस नज़रों में सिमट जाएँ,
और मुस्कान में छिप जाएँ।
पर फिर भी—
किसी एक पल में
जब सब कुछ थम-सा जाए,
हम एक-दूसरे को देख लें,
और बिना कुछ कहे
सब कुछ समझ जाएँ।
क्योंकि—
मोहब्बत हमेशा साथ रहना नहीं,
कभी-कभी दूर रहकर भी
एक-दूसरे में बसे रहना होता है।