अपने अतीत को जला देना चाहता हूँ,
जो हर कदम पर
मेरे बढ़ने की राह में
दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।
खुद को तो जला नहीं सकता,
अगर खुद को ही जलाना होता
तो इतनी दूर
मुंबई तक क्यों आता?
मैं तो बस
उस हिस्से को काट देना चाहता हूँ
जो ज़ंजीर बनकर
मेरे पैरों को
आगे बढ़ने नहीं देता।
मिटा देना चाहता हूँ
अपने हाथों की उन लकीरों को,
जो बार-बार
मेरे सपनों को देखकर
कहती हैं —
“यह तुम्हारे बस की बात नहीं।”
लेकिन एक दिन
ज़रूर साबित कर दूँगा
उन सब लोगों को,
जो मुझे
मेरे अतीत से,
मेरी भाषा से,
मेरी पृष्ठभूमि से
तौलते हैं।
एक दिन
मेरी मेहनत की आग
इतनी तेज़ जलेगी
कि वही अतीत
राख बन जाएगा,
और उसी राख से
मैं
अपना नया भविष्य
लिखूँगा।
~ विष्णु नारायण महानंद