मुझे ऐसी स्वतंत्रता, आज़ादी, एकता नहीं चाहिए,
जहाँ बोलने की आज़ादी ही न हो,
जहाँ विचार रखने पर पहरा हो,
और सवाल उठाओ तो ख़तरे का पहरा हो।
जहाँ आज़ादी की बात करो, तो धौंस दिखाई जाती है,
छात्रों को पुलिस की गाड़ी में उठाकर ले जाया जाता है,
मानो किसी आतंकी को रंगे हाथों पकड़ा हो,
ना कि किसी सपनों वाले छात्र को जिसने सच बोला हो।
जहाँ आलोचना करना गुनाह बने,
और सुरक्षाकर्मी कैमरे लेकर पीछा करें,
जहाँ किसी पीड़ित की सहानुभूति में खड़े होने पर
निर्दोष छात्रों के हाथों में हथकड़ी जड़ी जाए—
जैसे उन्होंने कोई भारी अपराध किया हो!
जहाँ “एकता दिवस” मनाने से पहले
“एकता” को ही टुकड़ों में बाँट दिया जाए,
जहाँ छात्र संसद को ही तोड़ दिया जाए
ताकि छात्र कभी एकजुट होकर अपनी आवाज़ न उठाए।
जहाँ हिन्दू–मुस्लिम के बीच दीवारें खड़ी की जाएँ,
और उसी दीवार के नाम पर “एकता” का पर्व मनाया जाए।
कहाँ खो गया वह देश,
जहाँ स्वाधीनता का अर्थ था खुलकर जीना?
क्यों आज देश की अखंडता के नाम पर
छात्रों की ही आज़ादी छीन ली जाती है?
मुझे नहीं चाहिए ऐसी झूठी स्वतंत्रता और ऐसी झूठी एकता—
जहाँ स्वतंत्रता की बात करते-करते ही
छात्रों की स्वतंत्रता छीन ली जाए,
जहाँ एकता का गीत गाने वालों की ही
एकता तोड़ दी जाए।
~विष्णु