जल, जंगल, ज़मीन
वे आए और बोले—
“हम तुम्हें नौकरी देंगे,
तुम्हारी झोपड़ी को महल बना देंगे।
तुम्हारे मारंग बुरु और बड़ादेव के लिए
भव्य मंदिर खड़ा कर देंगे।
बस हमें तुम्हारे
जल, जंगल, ज़मीन का थोड़ा-सा हिस्सा दे दो,
वहाँ हम अपनी कंपनी बसाएँगे।”
सरल आदिवासी,
जिन्होंने सदियों का संघर्ष देखा है,
उन्होंने साफ़ मना कर दिया—
दृढ़ता से, बिना झुके।
पर वे शहरी लोग
चालाकी से, छल से
अपनी कंपनियाँ बसा ही गए।
और वे यहीं नहीं रुके—
संघर्ष बढ़ता गया,
टकराव गहराता गया।
कई आदिवासी मारे गए—
कभी क़लिंगनगर,
कभी पापड़ाहांडी,
और न जाने कितनी अनकही जगहों पर।
फिर भी—
आदिवासी न झुके, न रुके।
आज भी वे लड़ रहे हैं—
अपने जल, जंगल, ज़मीन को बचाने के लिए।
वे सिर्फ अपने लिए नहीं,
पूरी दुनिया के लिए लड़ रहे हैं—
प्रकृति को बचाने के लिए,
धरती को जीवित रखने के लिए।
क्योंकि आदिवासी ही तो हैं
जो प्रकृति के साथ जीते हैं,
उसे पूजते हैं,
और उसे बचाने के लिए
सतत प्रयास करते हैं।
वे कहते हैं—
“आदिवासी हैं, तो प्रकृति है;
प्रकृति है, तो यह धरती है।”
फिर भी—
हमारी परंपराओं को अंधविश्वास कहा गया,
हमारी झोपड़ियों को नीचा दिखाया गया,
हमारे भोजन को ज़हरीला,
जानवरों का खाना बताया गया।
पर हम तो वही हैं—
जो प्रकृति में रहते हैं,
प्रकृति के लिए जीते हैं,
और प्रकृति के लिए
सीखते और लड़ते रहेंगे।