मुझसे उम्मीद मत रखना

मुझसे उम्मीद मत रखना

मुझसे उम्मीद मत रखना किसी गुलाब की,
क्योंकि मेरे बग़ीचे में गुलाब उगता नहीं।
मगर दे सकता हूँ तुम्हें अपने खेत का फूल,
शायद वो सूरजमुखी हो—
जो धूप में मुस्कुराना जानता है। 

मुझसे उम्मीद मत रखना
कि मैं तुम्हें बर्गर या पिज़्ज़ा खिलाऊँ,
क्योंकि मेरे घर में तो
बासी पखाल ही त्यौहार है।
उस खट्टे चावल में भी एक अपनापन है,
जो किसी होटल की प्लेट में नहीं मिलता। 

मुझसे उम्मीद मत रखना
कि हमारे रसोई में
गैस या बिजली के चूल्हे जलेंगे,
हमारे घर की महक तो
लकड़ी की आँच से उठती है,
जिसमें माँ के हाथों का स्वाद बसता है। 

मुझसे उम्मीद मत रखना
कि मैं तुम्हें महलों में रख सकूँ,
क्योंकि मेरा घर तो
मिट्टी की दीवारों से बना है।
पर वहाँ तुम्हें दिल की रानी बनाकर रखूँगा—
कभी खेतों की झोपड़ी में,
कभी पेड़ों के घर में
सपनों के संग सुलाऊँगा। 🏡💛

मुझसे उम्मीद मत रखना
कि मैं तुम्हें
दुबई, शिमला या ऊटी ले जाऊँ,
पर हाँ—मैं तुम्हें ज़रूर ले चलूँगा
दीक्षाभूमि, चैत्यभूमि, चिचोली,
और भीमराव के स्मारकों तक,
जहाँ मिट्टी में भी बराबरी की खुशबू आती है,
और हवा में आज़ादी के गीत गूंजते हैं।

क्योंकि मैं वही हूँ—
जो गुलाब नहीं उगाता,
पर सूरजमुखी बनकर जीना जानता है। 

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