मन करता है बंजारा बन जाऊँ,
फिर याद आता है—
कब से बंजारा बन ही तो गया हूँ।
स्कूलिंग के बाद से
इस जगह से उस जगह भटक रहा हूँ,
ठहरने का नाम ही नहीं ले रहा।
कभी-कभी यूँ ही चलते-चलते
थक भी जाता हूँ,
दिल की बात सुनने के लिए
पास में कोई नहीं होता।
अगर कोई होता भी है,
तो झिझक लगती है—
या शायद चुप रहना ही बेहतर लगता है
उनसे, जो महसूस ही न कर पाएँ।
शायद छब्बीस के आख़िर में
या सत्ताईस में कहीं ठहर जाऊँ,
तो बैठ जाऊँगा उसी पेड़ के नीचे
जो तुम्हारे नाम पर लगाया था।
खुलकर साँस लूँगा,
और जी लूँगा
एक पल सुकून से।