उगेगा सूरज ज़िंदगी का

 उगेगा सूरज ज़िंदगी का

ये दर्द को थोड़ा सहने देते,
वक्त को थोड़ा चलने देते हैं।
आख़िर कब तक साथ रहेगा दर्द,
ये बुरा वक्त परछाईं-सा कब तक रहेगा?

सिर्फ़ शाम के बाद अँधेरा ही नहीं होता,
इंतज़ार करो तो
पूरब में सूरज फिर उगता है।

दर्द को दूर कैसे कर दूँ,
जब सुख पाने की लालच अब भी है।
आँखों से निकले आँसुओं को
थोड़ा बहने देते।

झूठ में तो बहुत मुस्कुराए हैं,
आज गिर रहे हैं तो
थोड़ा खुद को गिरने देते।

आया हूँ बहुत दूर—
पूरब के कालाहांडी से
पश्चिम के मुंबई तक।

दिल में अब भी उम्मीद है,
तन-मन में एक कोशिश है—
कि मिट जाएँ ये सारे दुख-दर्द।

क्योंकि
उगेगा सूरज फिर से
पूरब से ही—
ज़िंदगी का।

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