धूल में उकेरी हुई दुनिया
बिबेक गाँव से मुंबई आया था—
एक प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ने के लिए।
कई लोगों के लिए यह बस एक उपलब्धि होगी,
पर उसके लिए यह एक लंबा संघर्ष था।
जिस जगह से वह आता है,
वहाँ संसाधनों की कमी है,
और अवसरों का दायरा भी सीमित है।
उसने ओड़िया माध्यम के
एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की थी,
जहाँ सपने तो थे,
पर उन्हें दिशा देने वाले साधन कम थे।
मुंबई आना उसके लिए
एक नई दुनिया में कदम रखने जैसा था।
पर यह शहर जितना बड़ा है,
उतना ही महँगा भी।
उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी थी
कि उसे एक चॉल में रहना पड़ता था—
जहाँ जगह कम थी,
पर उम्मीदें बड़ी।
एक दिन,
वह अपने कमरे से कॉलेज की ओर जा रहा था।
भीड़भाड़ वाली सड़क,
शोर और भागती हुई ज़िंदगी के बीच,
अचानक उसकी नज़र एक कार पर पड़ी।
कार के शीशे पर धूल जमी हुई थी,
पर उसी धूल में
किसी ने एक बेहद खूबसूरत चित्र उकेरा था।
बिबेक ठिठक गया।
कुछ पल के लिए
उसके कदम वहीं रुक गए।
वह उस चित्र को देखता रह गया—
मानो उस धूल में
किसी ने अपनी कहानी लिख दी हो।
उसने सोचा—
जिसे हम गंदगी समझकर अनदेखा कर देते हैं,
कोई और उसी में
अपनी कला और कल्पना का संसार बना देता है।
और शायद,
उस पल में बिबेक ने खुद को भी देखा—
एक ऐसी ज़िंदगी,
जो अभावों की “धूल” से ढकी हुई है,
पर उसी में
कुछ सुंदर गढ़ने की संभावना छिपी है।
वह हल्का-सा मुस्कुराया,
और फिर अपने रास्ते चल पड़ा—
शायद अब थोड़ा और विश्वास के साथ।