क्या मैं पापी हूँ?
@विष्णु नारायण महानंद
ऐसा कौन सा पाप हो जाता है मुझ से,
जो हर माह अछूत हो जाती हूं मैं ??
अगर किसी को छू लेती हूँ तो,
वो अपवित्र कैसे हो जाएगा ??
क्या ऋतुस्राव होना पाप है ?
जिस ऋतुस्राव से मानव सृष्टि का जन्म हुआ,
वो पाप कैसे हो जाता है ?
पुजारी कहता है, तू मंदिर में मत आना,
पिताजी कहते हैं, तू रसोई में मत आना!!
मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ,
बस उदास हो जाती हूँ,
क्यों करते हो पिताजी ऐसा ?
क्यों करते है पुजारी ऐसा ?
जिसे ऋतुस्त्राव को तुम पाप कहते हो,
उस तथाकथित पाप प्रक्रिया से ही तो,
तुमने जन्म लिया है ,
फिर तुम कैसे खुद को पवित्र कह सकते हो ?
अगर तुम पवित्र तो फिर,
मैं कैसे अपवित्र हो जाती हूँ?
समझा दो ना मुझे !
यह बात समझने तो दो एक बार,
फिर मैं न जाउंगी रसोई के अंदर,
फिर मैं न जाउंगी मंदिर के अंदर,
है कोई जवाब नहीं तुम्हारे पास ?
बोलो, अब क्यों निःशब्द हो जाते हो तुम!!
फिर मैं पढ़ती हूं सारे वो पन्ने, सारे वो ग्रन्थ ,
और समझ जाती हूं सब कुछ ।
नारी की स्वाधीनता को रोक देते हैं,
पांवों में पहना दे हैं, गुलामी की जंजीर,
वो सारे लिखे पन्ने, वो सारे ग्रंथ!!
यहां तो चरित्रहीनता के शक में,
रोज अग्नि परीक्षा से गुजरती है नारी।
क्या धर्म ऐसा कहता है??
उसे वंचित रखो शिक्षा से ,
कहीं हमारी साजिश को ही,
ना समझ जाएं ये नारी !!
नहीं, तुम सबला हो,
अब समय आ गया है,
तुम तोड़ो दास्तां की जंजीरे,
आगे बड़ो, ऋतु स्त्राव है ताकत तुम्हारी।
कवि : विष्णु नारायण महानंद
( ओड़िया भाषा में मूल रचना )
हिंदी अनुवाद : ममता नायक
संपादन : तरुण कुमार