तुम लौट के आना 3.0

 तुम लौट के आना

चांद से उतर कर।

नर्मदा के किनारे तुम्हें मिलना है

तुम लौट आना 

समुंदर से नर्मदा बनकर।

आज भी गांव में अंधेरा है

तुम लौट के आना

शिक्षा की रोशनी ले कर।

आज AI की युग है

कविता और कहानी बहुत सारे है

मगर तुम्हारे आवाज में सुनना है

तुम लौट के आना

बहुत सारी कविताएँ और कहानियाँ लेकर।

Remote मैं व्यवस्था तो है

मगर ब्याबस्तित नहीं है

तुम लौट के आना

एक क्रांति की मशाल बन कर।

यहां तो दो मजहब और जाती में

विद्रोह है

तुम लौट के आना

एक मोहब्बत और समता की शिक्षिका बनकर।

यहां तो गरीब लूटे जा रहे है

महिलाएं शोषण हो रहे है

अधिकारी अनपढ़ को घुमा रहे है

तुम लौट के आना

काली कोट में कलम लेकर।

नन्हें मुन्हें के लिए बगीचा बनाएंगे

तुम लौट के आना

हमारा साथ देना

बस तुम लौटकर आना।

~विष्णु (26/02/2025)

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तुम लौट के आना...


तुम लौट के आना

नहीं तो में खाई के उस पार का रह जाऊंगा

और तुम इस पार का

हम चाहे भी जोड़ नहीं सकते।

तुम्हें पता हीं होगा

Remote इलाकों में विकाश की चित्र

सरकार विकाश की डिंडिम पिटेगा

और उनके लिए रिमोट की विकाश विकास नहीं है

हम दोनों को जोड़ने के लिए कोई bridge बनेगा ही नहीं।

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तुम लौट के आना


तुम जिंदगी की शाम की तरह मत ढल जाना

लौट आना मेरे पास 

बहुत सारा स्मृतियां अनुभव लेकर।

टपरी में दो कप चाय के साथ

अनावरण करोगे अपने दिल और स्मृति में इकट्ठा किए हुए स्मृतियों, अनुभवों और कहानियों।

में तुम्हें चाहते हुए सुनते रह जाऊंगा

एक अच्छा सुनने वाला एक अच्छा दोस्त होता है ना।

स्कूल में बच्चों के साथ साझा किया

अनगिनत मुस्कान और प्यार

हमेशा पास में रखना,

लोगों को देते रहना,

पैसा प्रॉपर्ट रहते हुए लोग दुःखी रह जाते।

तुम लौट के आना

बहुत सारा प्यार और मुस्कान लेकर।

लोग तो दूसरों को खिलौना समझते

तुम सिर्फ नर्मदा की पानी की तरह सरल मत बनना,

माथेरान की पत्थरों की चट्टान की तरह भी बनना,

ताकि कठिनाइयों का सामना कर सकें।

तुम किचेन गार्डन की फूल की तरह  हृदय को रखना

ताकि हमेशा मेरे चाहत में रह सकों।

तुम नर्मदा की पानी की तरह मत बह जाना समुंदर को

तुम लौटकर आना।

आकाश की चांद तारों की तरह मेरे से दूर मत रहना

ख्वाइश है मेरे छांव की तरह हमेशा मेरे साथ रहना

तुम लौटकर आना।

~विष्णु (23/02/25)

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तुम लौट के आओ


तुम्हारे चेहरे की मुस्कान से
मेरे चेहरे पर भी खिल उठती है हँसी,
तुम्हें देखते ही
मन को मिल जाता है सुकून कहीं।

तुम्हारा नाम सुनते ही
एक ठहराव-सा आ जाता है,
जैसे भीड़ भरे इस शहर में
दिल को अपना कोई मिल जाता है।

मैं और भी बहुत कुछ लिखूँगा,
अधूरी बातों को पूरा कर दूँगा,
तुम बस लौट के आओ—
इन खामोशियों को फिर से गुनगुनाने दूँगा।

आज गया था Charni Road,
पर मौसम अजीब-सा लगा,
अप्रैल की गर्मी थी हवा में,
दिल कहीं ठहरा-सा लगा।

तुम होते तो वही रास्ते
फरवरी की ठंडी शाम बन जाते,
हर मोड़, हर लम्हा
इश्क़ के रंग में ढल जाते।

तुम आओ ज़िंदगी में मेरे,
हम इसे फिर से हरा-भरा बनाएँगे,
सूखी सी इन यादों में
मोहब्बत के फूल खिलाएँगे।

बस एक ही ख्वाहिश है—
तुम लौट के आओ…

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मुस्कान 


निःशब्द हो गया हूं अब में,

जो कुछ भी हो

प्राण को निचोड़ के लिखा था

"तुम लौट के आना 1.0, 2.0 और 3.0"

और सुनाया भी था सबको साहित्य संगम में।

अभी तुम से सुनना चाहता हूं

दो लाइनें, कुछ कहानी।

नागौरी के चाय के साथ

उत्साह से पूछूंगा, आगे और सुनाओ ना !

तुम्हारे हृदय से निकले शब्दों से

एक एक शब्द ले कर

फिर से में खुद को संवार लूंगा।

हां तुम लौट के आना

मुस्कान ले कर, 

बहुत सारे पंक्तियां और कहानी ले कर

फिर से में तुम से, तुम्हारे मीठे मीठे अल्फ़ाज़ से जिंदा हो जाऊंगा।

~विष्णु 




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