रात के खाने के बाद मम्मी का कॉल आया। ज़्यादातर दिनों में वे इसी समय फोन करती हैं और मेरा हालचाल पूछती हैं। उस समय मैं लाइब्रेरी में काम कर रहा था। मोबाइल वाइब्रेट हुआ, देखा—मम्मी का कॉल है। मैंने कॉल उठाया और बात करते-करते TISS मुंबई की SDTM लाइब्रेरी के सामने वाले पेड़ के चौराहे पर बैठ गया।
उसी दौरान, खाने के बाद एक दृष्टिबाधित छात्रा अपनी सफेद छड़ी के साथ वहाँ से गुज़री। वह अकेले, बिल्कुल सामान्य लोगों की तरह चल रही थी—न कोई हिचक, न कोई डर, बस अपने रास्ते पर विश्वास के साथ। मैं कुछ पल के लिए ठहर-सा गया। सोचा—उनके सामने तो अंधेरा ही अंधेरा है, फिर भी वे कितनी बेफिक्र होकर चल रही हैं। और इधर हम, जिनके पास दो आँखें हैं, अक्सर अपने रास्ते को अंधेरा मान लेते हैं, हर कदम पर संदेह करते हैं।
कितना अजीब है ना—हम इस रंगीन दुनिया को देखने में सक्षम होते हुए भी अपने ही मन के अंधेरों में उलझे रहते हैं। भविष्य की चिंता, पीछे छूट जाने का डर—“who will come late, they miss the boat”—ये विचार हमें रोक लेते हैं। जबकि सच तो यह है कि रास्ता वही देख पाता है, जो चलने का साहस रखता है।
यही सोचते-सोचते मैं कहीं खो गया।
उधर मम्मी बार-बार पूछ रही थीं—“हेलो… कॉल कट गया क्या?”
कुछ देर बाद उन्होंने कॉल काट दिया, यह सोचकर कि शायद सच में कॉल कट गया। और मैं कुछ देर तक वहीं बैठा रहा—थोड़ा भावुक, थोड़ा शांत, और शायद थोड़ा बदला हुआ।