तुम्हें पाने या न पाने के इस द्वंद्व में रहकर भी,
पाने की ख्वाहिश हर पल दिल में बसाए रखता हूँ।
इसी वजह से तुम्हें हर जगह ढूँढ लेता हूँ,
तुम्हारी वो खूबसूरत दो आँखें और मुस्कुराहट,
आज भी अपने दिल में संभालकर रखता हूँ।
तुम्हारी हर पोस्ट पढ़कर तुम्हें महसूस करता हूँ,
जैसे हर शब्द में तुम्हारी एक झलक मिल जाती है।
मन करता है तुम्हें लिख दूँ दिल की सारी बातें,
इस दिल के दरिया से बहते हुए एहसास,
फिर सोचता हूँ…
कहीं तुम्हें बुरा न लगे,
और तुम मुझसे दूर न हो जाओ।
तुम्हारी कला, तुम्हारा आर्किटेक्चर,
मुझे बेहद पसंद है…
तुम्हें चाहते-चाहते, ये सब और भी पसंद आ गया है।
तुम्हारे लिए बहुत सी कविताएँ लिखी हैं मैंने,
मैं कोई कवि तो नहीं,
मगर हर बार खुद को निचोड़कर लिखा है।
हमारे बीच मजहब, जात, बोली और सरहद,
दीवारों की तरह खड़ी हैं…
फिर भी दिल है कि मानता नहीं,
और तुम्हें पाने की ख्वाहिश अब भी ज़िंदा है।