सोच


किसी ने (Jr Ravi) कहा—

“सौचालय में सोच आती है,”

कहीं पढ़ा था हमने भी—

उसे Think Chamber कहा जाता है।


भीड़ में हम खुद को खो देते हैं,

और अकेले में भी कहाँ मिल पाते हैं,

कभी भावनाओं में डूबे,

कभी किसी अनकही सोच में,

कुछ अलग सा,

कुछ सृजनशील सा।


Think Chamber से बाहर आते ही,

यादें दरवाज़ा खटखटाती हैं—

उनकी,

जिन्हें हम पाँच साल पहले खो आए थे।


तब मन पूछता है—

“क्या हमारी याददाश्त इतनी मजबूत है?”


हम खुद पर ही भरोसा नहीं कर पाते—

कभी जूते पैक कर के भूल जाते हैं,

तो कभी घड़ी का ध्यान

मंज़िल पर पहुँचकर आता है।

एक बार तो ऐसा भी हुआ—

परीक्षा केंद्र में परीक्षा दिए और चले आए,

और चप्पल पहनना ही भूल गए।


अजीब है यह भूलने की आदत—

कुछ न कुछ छूट ही जाता है,

हर बार,

Think Chamber से बाहर आते ही।


एक दिन तो हद हो गई—

अपने ही घर का आँगन भूल गए,

अठारह मिनट बाद

याद आया कि घर भी है कहीं।


अब चाह है किसी ऐसी दवा की—

जो उन चेहरों को भुला दे,

जो हर पल सताते हैं।

उन लम्हों को मिटा दे,

जो चुपके-चुपके रुलाते हैं।


पर शायद—

कुछ यादें भूलने के लिए नहीं होतीं,

वे ही तो हैं

जो हमें इंसान बनाए रखती हैं।

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