आज़ादी-आज़ादी बोलते,
बस्ती में बच्चे चलते,
नेता स्कूल में भाषण देते,
गाँव से शहर तक जश्न सजते।
पर कहीं दलित खोज रहे थे,
रास्ते पर चलने की आज़ादी,
शादी में घोड़े पर बैठने की
छोटी-सी पर अनमोल आज़ादी।
कहीं नौजवान चाहते थे
अभिव्यक्ति की खुली उड़ान,
कहीं महिलाएँ ढूँढ रही थीं
अकेले चलने का सम्मान।
कहीं कॉलेज के आँगन में
सवाल पूछने की थी प्यास,
पर सब बेवस, दिल में आह लिए
जश्न में हुए शामिल, थी यही आस।
~विष्णु